नई दिल्ली: पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण (Ethanol Blending Programme) को भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। सरकार वर्ष 2025-26 तक पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है। इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होने और कार्बन उत्सर्जन घटाने की उम्मीद है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि एथेनॉल उत्पादन के बढ़ते विस्तार का देश के जल संसाधनों और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
1 लीटर एथेनॉल बनाने में कितना पानी लगता है?
भारत में एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने, चावल और मक्का से बनाया जाता है। इनमें पानी की खपत अलग-अलग होती है।
फीडस्टॉक के अनुसार पानी की खपत (प्रति लीटर एथेनॉल)
|
कच्चा माल |
अनुमानित जल खपत |
|---|---|
|
चावल आधारित एथेनॉल |
10,000 से 10,790 लीटर |
|
मक्का आधारित एथेनॉल |
लगभग 4,670 लीटर |
|
गन्ना आधारित एथेनॉल |
2,860 से 3,630 लीटर |
विशेषज्ञों के अनुसार एथेनॉल उत्पादन में सबसे अधिक पानी खेती के दौरान खर्च होता है, जबकि प्रसंस्करण संयंत्रों में पानी की खपत अपेक्षाकृत कम होती है। चावल आधारित एथेनॉल को सबसे अधिक जल-गहन माना जाता है।
किन राज्यों में पानी का संकट सबसे अधिक?
भारत पहले ही गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। नीति आयोग के अनुसार देश के लगभग 60 करोड़ लोग उच्च या अत्यधिक जल तनाव वाले क्षेत्रों में रहते हैं।
सबसे अधिक जल संकट वाले राज्य:
-
पंजाब – भूजल दोहन सबसे अधिक, कई ब्लॉक "ओवर-एक्सप्लॉइटेड" श्रेणी में।
-
हरियाणा – सिंचाई के लिए अत्यधिक भूजल उपयोग, तेजी से गिरता जल स्तर।
-
राजस्थान – कम वर्षा और अत्यधिक भूजल दोहन।
-
उत्तर प्रदेश – पश्चिमी और मध्य क्षेत्रों में भूजल दबाव बढ़ रहा है, जबकि राज्य एथेनॉल उत्पादन का प्रमुख केंद्र है।
-
महाराष्ट्र – गन्ना आधारित उद्योगों के कारण सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जल दबाव बढ़ा है।
-
कर्नाटक और तेलंगाना – कई जिलों में जल स्तर तेजी से गिर रहा है।
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि जल-संकट वाले राज्यों में गन्ना और चावल आधारित एथेनॉल उत्पादन बढ़ता रहा, तो आने वाले वर्षों में पेयजल और कृषि दोनों पर दबाव बढ़ सकता है।
एथेनॉल उत्पादन से कितना प्रदूषण होता है?
हालांकि एथेनॉल को पारंपरिक पेट्रोल की तुलना में "स्वच्छ ईंधन" माना जाता है, लेकिन इसके उत्पादन से कई प्रकार के पर्यावरणीय प्रभाव भी सामने आते हैं।
1. जल प्रदूषण
एथेनॉल संयंत्रों से निकलने वाला अपशिष्ट (Spent Wash) अत्यधिक जैविक भार (BOD/COD) वाला होता है। यदि इसका उचित उपचार न किया जाए तो यह नदियों, तालाबों और भूजल को प्रदूषित कर सकता है।
2. वायु प्रदूषण
डिस्टिलरी इकाइयों से कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा अन्य गैसों का उत्सर्जन होता है। हालांकि पेट्रोल की तुलना में वाहन उत्सर्जन कम हो सकता है, लेकिन उत्पादन प्रक्रिया में ऊर्जा की खपत अधिक रहती है।
3. भूजल पर दबाव
गन्ना और चावल जैसी जल-गहन फसलों के बढ़ते उत्पादन से भूजल स्तर लगातार नीचे जा सकता है। कई विशेषज्ञ इसे "वाटर-टू-फ्यूल" मॉडल बताते हैं।
4. खाद्य सुरक्षा पर असर
चावल और मक्का जैसी खाद्यान्न फसलों का उपयोग ईंधन उत्पादन में बढ़ने से भविष्य में खाद्य कीमतों और खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
सरकार का पक्ष क्या है?
सरकार का कहना है कि एथेनॉल कार्यक्रम से:
-
कच्चे तेल के आयात में कमी आएगी।
-
किसानों की आय बढ़ेगी।
-
कार्बन उत्सर्जन घटेगा।
-
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
हालांकि विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि भविष्य में कृषि अवशेष (Crop Residue), बायोमास और सेकेंड जनरेशन (2G) एथेनॉल पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए, ताकि पानी और खाद्यान्न पर दबाव कम हो सके।
निष्कर्ष
भारत का एथेनॉल मिशन ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है, लेकिन इसके साथ जल संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन को प्राथमिकता देना भी उतना ही आवश्यक है। यदि जल-संकट वाले राज्यों में बिना योजना के एथेनॉल उत्पादन बढ़ाया गया, तो भविष्य में देश को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि "ऊर्जा सुरक्षा" और "जल सुरक्षा" के बीच संतुलन बनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।