नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसले में स्पष्ट किया है कि जांच एजेंसियां बिना अदालत की अनुमति बैंक खातों को फ्रीज़ नहीं कर सकतीं। यह आदेश **W.P.(C) 4198/2025 – Malabar Gold and Diamond Limited & Ors. बनाम Union of India & Ors. के मामले में पारित किया गया।
अदालत ने Malabar Gold and Diamond Limited के बैंक खातों को तत्काल डी-फ्रीज़ (Defreeze) करने का निर्देश देते हुए कहा कि BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 106 और 107 के तहत किसी भी जांच एजेंसी को यह अधिकार नहीं है कि वह बिना मजिस्ट्रेट के आदेश या याचिकाकर्ता की कथित धोखाधड़ी में प्रत्यक्ष संलिप्तता के ठोस प्रमाण के बैंक खाते फ्रीज़ कर दे।
🏛️ हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
Delhi High Court ने सुनवाई के दौरान साफ शब्दों में कहा कि—
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जांच एजेंसियों की शक्तियां कानून द्वारा सीमित हैं
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केवल संदेह या जांच के आधार पर बैंक खाते फ्रीज़ करना कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है
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जब तक किसी व्यक्ति या कंपनी की सीधी भूमिका (Complicity) साबित न हो, तब तक ऐसी कार्रवाई अवैध मानी जाएगी
कोर्ट ने यह भी माना कि बैंक खातों के फ्रीज़ होने से किसी कंपनी की व्यावसायिक गतिविधियां ठप हो जाती हैं, जिससे कर्मचारियों, व्यापारिक साझेदारों और ग्राहकों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
🏦 Malabar Gold को बड़ी राहत
Malabar Gold की ओर से दलील दी गई कि कंपनी का किसी भी कथित वित्तीय अनियमितता या धोखाधड़ी से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। बिना किसी वैध न्यायिक आदेश के बैंक खातों को फ्रीज़ करना मनमानी और असंवैधानिक है। अदालत ने इन दलीलों से सहमति जताते हुए तुरंत राहत प्रदान की।
📌 फैसले का व्यापक प्रभाव
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में जांच एजेंसियों द्वारा बैंक खाते फ्रीज़ करने की प्रक्रिया पर स्पष्ट दिशानिर्देश तय करेगा। यह निर्णय कॉरपोरेट संस्थाओं और व्यापारिक इकाइयों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से भी बेहद अहम माना जा रहा है।
🔎 मुख्य बिंदु (Key Points)
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दिल्ली हाईकोर्ट ने Malabar Gold के बैंक खाते तुरंत डी-फ्रीज़ करने का आदेश दिया
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BNSS की धारा 106 और 107 के तहत मजिस्ट्रेट आदेश अनिवार्य
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बिना अदालत की अनुमति खाते फ्रीज़ करना अवैध
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याचिकाकर्ता की संलिप्तता के ठोस सबूत जरूरी
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जांच एजेंसियों की शक्तियों पर न्यायिक नियंत्रण स्पष्ट